गीजा के पिरामिड एक वैज्ञानिक चुनौती!!

आज से 4 से 5 हजार वर्ष पूर्व दुनिया के हर कोने में लगभग एक ही काल में पिरामिड बनाए गए। यह वही काल था जबकि मिस्र में पिरामिड बने थे। यह वह काल था जबकि इजिप्ट, सुमेरिया, बेबीलोनिया, मेसोपोटामिया, असीरिया, मेहरगढ़, सैंधव, पारस्य आदि प्राचीन सभ्यताएं अपने विकास के चरम पर थीं।

मिस्र के पिरामिड वहां के तत्कालीन फैरो (सम्राट) गणों के लिए बनाए गए स्मारक स्थल हैं, जिनमें राजाओं के शवों को दफनाकर सुरक्षित रखा गया है। इन शवों को ममी कहा जाता है। उनके शवों के साथ खाद्यान, पेय पदार्थ, वस्त्र, गहनें, बर्तन, वाद्य यंत्र, हथियार, जानवर एवं कभी-कभी तो सेवक सेविकाओं को भी दफना दिया जाता था।

भारत की तरह ही मिस्र की सभ्यता भी बहुत पुरानी है और प्राचीन सभ्यता के अवशेष वहाँ की गौरव गाथा कहते हैं। यों तो मिस्र में १३८ पिरामिड हैं और काहिरा के उपनगर गीज़ा में तीन लेकिन सामान्य विश्वास के विपरीत सिर्फ गिजा का ‘ग्रेट पिरामिड’ ही प्राचीन विश्व के सात अजूबों की सूची में है। दुनिया के सात प्राचीन आश्चर्यों में शेष यही एकमात्र ऐसा स्मारक है जिसे काल प्रवाह भी खत्म नहीं कर सका।

यह पिरामिड ४५० फुट ऊंचा है। ४३ सदियों तक यह दुनिया की सबसे ऊंची संरचना रहा। १९वीं सदी में ही इसकी ऊंचाई का कीर्तिमान टूटा। इसका आधार १३ एकड़ में फैला है जो करीब १६ फुटबॉल मैदानों जितना है। यह २५ लाख चूनापत्थरों के खंडों से निर्मित है जिनमें से हर एक का वजन २ से ३० टनों के बीच है। ग्रेट पिरामिड को इतनी परिशुद्धता से बनाया गया है कि वर्तमान तकनीक ऐसी कृति को दोहरा नहीं सकती। कुछ साल पहले तक (लेसर किरणों से माप-जोख का उपकरण ईजाद होने तक) वैज्ञानिक इसकी सूक्ष्म सममिति (सिमट्रीज) का पता नहीं लगा पाये थे, प्रतिरूप बनाने की तो बात ही दूर! प्रमाण बताते हैं कि इसका निर्माण करीब २५६० वर्ष ईसा पूर्व मिस्र के शासक खुफु के चौथे वंश द्वारा अपनी कब्र के तौर पर कराया गया था। इसे बनाने में करीब २३ साल लगे।

म्रिस के इस महान पिरामिड को लेकर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं कि बिना मशीनों के, बिना आधुनिक औजारों के मिस्रवासियों ने कैसे विशाल पाषाणखंडों को ४५० फीट ऊंचे पहुंचाया और इस बृहत परियोजना को महज २३ वर्षों मे पूरा किया? पिरामिड मर्मज्ञ इवान हैडिंगटन ने गणना कर हिसाब लगाया कि यदि ऐसा हुआ तो इसके लिए दर्जनों श्रमिकों को साल के ३६५ दिनों में हर दिन १० घंटे के काम के दौरान हर दूसरे मिनट में एक प्रस्तर खंड को रखना होगा। क्या ऐसा संभव था? विशाल श्रमशक्ति के अलावा क्या प्राचीन मिस्रवासियों को सूक्ष्म गणितीय और खगोलीय ज्ञान रहा होगा? विशेषज्ञों के मुताबिक पिरामिड के बाहर पाषाण खंडों को इतनी कुशलता से तराशा और फिट किया गया है कि जोड़ों में एक ब्लेड भी नहीं घुसायी जा सकती। मिस्र के पिरामिडों के निर्माण में कई खगोलीय आधार भी पाये गये हैं, जैसे कि तीनों पिरामिड आ॓रियन राशि के तीन तारों की सीध में हैं। वर्षों से वैज्ञानिक इन पिरामिडों का रहस्य जानने के प्रयत्नों में लगे हैं किंतु अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है।

 

रोचक तथ्य

1.ग्रेट पिरामिड एक पाषाण-कंप्यूटर जैसा है। यदि इसके किनारों की लंबाई, ऊंचाई और कोणों को नापा जाय तो पृथ्वी से संबंधित भिन्न-भिन्न चीजों की सटीक गणना की जा सकती है।
2.ग्रेट पिरामिड में पत्थरों का प्रयोग इस प्रकार किया गया है कि इसके भीतर का तापमान हमेशा स्थिर और पृथ्वी के औसत तापमान २० डिग्री सेल्सियस के बराबर रहता है। यदि इसके पत्थरों को ३० सेंटीमीटर मोटे टुकड़ों मे काट दिया जाए तो इनसे फ्रांस के चारों आ॓र एक मीटर ऊंची दीवार बन सकती है।
3.पिरामिड में नींव के चारों कोने के पत्थरों में बॉल और सॉकेट बनाये गये हैं ताकि ऊष्मा से होने वाले प्रसार और भूंकप से सुरक्षित रहे।
4.मिस्रवासी पिरामिड का इस्तेमाल वेधशाला, कैलेंडर, सनडायल और सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी की गति तथा प्रकाश के वेग को जानने के लिए करते थे।
5.पिरामिड को गणित की जन्मकुंडली भी कहा जाता है जिससे भविष्य की गणना की जा सकती है।
कुछ लोग पिरामिडों में स्थित जादुई असर की बात भी करते हैं जो मानव स्वास्थ्य पर शुभ प्रभाव डालता है।

6.स्वस्तिक है पिरामिड का प्रतीक :स्वस्तिक का आविष्कार आर्यों ने किया और पूरे विश्‍व में यह फैल गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्वस्तिक अपने आप में एक पिरामिड है, एक कागज का स्वस्तिक बनाइए और फिर उसकी चारों ‍भुजाओं को नीचे की ओर मोड़कर बीच में से पकड़िए। इसे करने पर यह पिरामिड के आकार का दिखाई देखा।

7.उत्तर और दक्षिण गोलार्ध :पिरामिड पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि सभी पिरामिड उत्तर-दक्षिण एक्सिस पर बने हैं अर्थात उन सभी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध के प्रभाव को जानकर बनाया गया है। इसका भू-चुम्बकत्व एवं ब्रह्मांडीय तरंगों से विशिष्ट संबंध है।

8 .मिस्र के पिरामिडों की ही तरह दुनिया में कई जगह पिरामिड बनाए गए हैं। हालांकि मिस्र जैसे पिरामिडों का निर्माण आज भी संभव नहीं है। आज तक वैज्ञानिक व इतिहासविद इस अबूझ पहेली को नहीं जान पाए कि पिरामिड के निर्माण में किस तरह की तकनीक और सामानों का प्रयोग किया गया था। यह अचरज की बात है कि हजारों साल बाद तक भी ये पिरामिड सुरक्षित हैं और इनकी चमक बरकरार है। खैर, आप जानिए आधुनिक समय में कहां-कहां बने हैं पिरामिड.

* लॉस वेगास में 4,000 कमरों वाले होटल लक्सर को पिरामिड की शक्ल दी गई है।
* पेरिस के लौवरे में शीशे (ग्लास) का इस्तेमाल करते हुए पिरामिड बनाए गए हैं।
* कजाकिस्तान में 203 ऊंचे पिरामिडों का निर्माण कराया गया है।
* भारत के पूना में ओशो आश्रम में ध्यान के लिए दो विशालकाय पिरामिड बनाए गए हैं।
9. मिस्र के पिरामिड :जब पिरामिड की बात आती है तो मिस्र या इजिप्ट के पिरामिडों की ज्यादा चर्चा होती है। ऐसा क्यों? क्योंकि वे अभी तक अच्छे से संरक्षित हैं जबकि भारत, चीन और मध्य एशिया के पिरामिड तो युद्ध में तबाह हो गए। दरअसल मिस्र के पिरामिड पुरानी खो गई सभ्‍यता के तीर्थ है जो अब मकबरें में बदल गए हैं। मिस्र में 138 पिरामिड हैं और काहिरा के उपनगर गीजा में तीन। हालांकि जमीन में अभी भी इतने ही और पिरामिड दबे हुए हैं। गिजा का ‘ग्रेट पिरामिड’ ही प्राचीन विश्व के 7 अजूबों की सूची में शामिल है। यह पिरामिड 450 फुट ऊंचा है। लगभग 4,000 वर्षों तक यह दुनिया की सबसे ऊंची संरचना रहा है।

10.

पिरामिडों में ही शव क्यों रखे जाते हैं?
 पिरामिडों की कुल ऊंचाई की ऊंचाई पर रखे शव (ममी) आज तक अविकृत हैं। पिरामिड में प्रकाश, जलवायु तथा ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रूप में रहता है जिसके चलते कोई भी वस्तु विकृत नहीं होती। यह रहस्य प्राचीन काल के लोग जानते थे। इसीलिए वे अपनी कब्रों को पिरामिडनुमा बनाते थे और उसको इतना भव्य आकार देते थे कि वह हजारों वर्ष तक कायम रहे।
                          प्राचीन मिस्री सम्राट अखातून का नाम संस्कृत में अक्षय्यनूत का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है शरीर अक्षय्य तथा नित नया रहता है। इस प्रकार पिरामिड विद्या अमरता की विद्या है। प्रतिदिन कुछ समय तक पिरापिड में रहने से व्यक्ति की बढ़ती उम्र रुक जाती है।
11. मिस्र के पिरापिडों पर आज भी शोध जारी है।हर बार यहां नए रहस्यों का पता चलता है। समय समय पर दुनिया भर के इंजीनियर और वैज्ञानिक पिरामिड और ममी से जुड़े रहस्यों को समझे के लिए शोध करते रहते हैं। इसी तरह के एक शोध में जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय में कुछ वैज्ञानिक एक 12 सेंटीमीटर लंबी बोतल के अंदर के राज जानना चाह रहे हैं जो इथोपिया के एक पिरामिड से मिली है। ये खूबसूरत छोटी सी बोतल धातु की नहीं है। मिट्टी और सगंमरमर की बनी है। बोतल करीब साढ़े तीन हजार साल पुरानी बताई जा रही है जिसमें सूख चुका इत्र है।
वैज्ञानिकों ने इस बोतल का सिटी स्कैन किया और पता चला कि इत्र सूख चुका है। खोज बीन करने वालों के मुताबिक इस इत्र का इस्तेमाल मिस्त्र की तत्कालीन राजकुमारी फाराओ हेट्सेप्सुट करती थीं। हेट्सेप्सुट ने तब के मिस्र पर पच्चीस साल तक राज किया। बहरहाल, वैज्ञानिक चाहते हैं कि इस इत्र की हूबहू नकल तैयार की जाए।
हालांकि मिस्र के विश्व-प्रसिद्ध गीजा के पिरामिड के अंदर क्या है यह जानने में अभी और समय लगेगा। इसके अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं है।
12. हालांकि वैज्ञानिक को अभी तक यह समझ में नहीं आ रहा हैं कि पिरामिड के ऊपर ऐसा क्या है जो इतनी तेज बिजली का उत्पादन कर सकता है कि संपूर्ण पिरामिठ बिजली से रोशन हो जाए।
 एक अरबी गाइड की सहायता से ग्रेट पिरामिड के सबसे उपर पहुंचे सर सीमन ने इसका खुलास किया था कि ग्रेट पिरामिड का संबंध आसमानी बिजली से है। इसी तरह गीजा के पिरामिड में ही नहीं दुनियाभर के पिरामिड अभी भी रहस्य की चादर में लिपिटे हुए हैं।

गिज़ा के महान पिरामिड 

गिज़ा का सबसे बड़ा पिरामिड 146 मीटर उँचा था। ऊपर का 10 मीटर अब गिर चुका है। उसका आधार क़रीब 54 या 55 हज़ार मीटर का है। अनुमान है कि 3200 ईसा पूर्व उसे बनाया गया था। यह इसके बावजूद है कि उस समय की मिस्रियों की टेक्नोलॉजी शून्य के समान थी!

गीज़ा के पिरामिड, प्राचीन मिस्र की सभ्यता के सबसे ज़्यादा पहचाने जाने वाले प्रतीकों में से एक हैं।

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